
बलरामपुर/(शोएब सिद्दिकी) जिले का सबसे बड़ा स्वास्थ्य केंद्र — जिला चिकित्सालय — आज खुद इलाज का मोहताज नजर आ रहा है, दूर-दराज के गांवों से उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों को यहां इलाज से ज्यादा “रेफर” का पर्चा मिलता है।
सवाल यह है कि आखिर जिला अस्पताल अपनी भूमिका निभा क्यों नहीं पा रहा?समय पर डॉक्टर नहीं, इंतजार में मरीज
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई डॉक्टर निर्धारित समय पर अस्पताल नहीं पहुंचते और समय से पहले चले जाते हैं। ऐसे में घंटों लाइन में लगे ग्रामीण मरीजों को निराश होना पड़ता है।
विशेषज्ञ हैं… लेकिन निदान पर सवाल
अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर पदस्थ तो हैं, लेकिन मरीजों का कहना है कि कई मामलों में बीमारी की सही पहचान नहीं हो पाती। छोटी-छोटी समस्याओं में भी तत्काल रेफर कर दिया जाता है।
जब सामान्य उपचार भी जिला स्तर पर संभव नहीं हो पा रहा, तो फिर जिला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में फर्क क्या रह गया?
इमरजेंसी में भी इंतजार!
आपातकालीन वार्ड की स्थिति भी चिंता का विषय बताई जा रही है। देर रात आपात स्थिति में डॉक्टरों को फोन कर बुलाना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इमरजेंसी सेवाएं 24×7 पूरी तरह सक्रिय हैं?
व्यवहार और व्यवस्था दोनों पर प्रश्न
कुछ परिजनों ने स्टाफ के व्यवहार को लेकर भी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि मरीजों के साथ संवेदनशील व्यवहार की अपेक्षा रहती है, लेकिन कई बार उन्हें उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।
कुछ डॉक्टर हैं जो ईमानदारी से अपना काम करते हैं और समय का पालन करते हैं!
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या पूरे जिला अस्पताल की व्यवस्था एक या दो डॉक्टरों के भरोसे चलनी चाहिए?
जिम्मेदारी किसकी?
यह खबर किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं, बल्कि व्यवस्था की हकीकत को सामने लाने की शुरुआत है। यदि विशेषज्ञ उपलब्ध हैं तो फिर बार-बार रेफर क्यों? यदि अस्पताल जिला स्तर का है तो सेवाएं प्राथमिक केंद्र जैसी क्यों महसूस हो रही हैं?
अब निगाहें जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर हैं। क्या कलेक्टर औचक निरीक्षण करेंगे? क्या स्वास्थ्य विभाग व्यवस्था सुधारेगा?
“दैनिक लक्ष्य संदेश” इस मुद्दे को यहीं नहीं छोड़ेगा।
यह तो बस शुरुआत है — जब तक व्यवस्था में सुधार नहीं दिखता, तब तक अस्पताल की जमीनी हकीकत सामने आती रहेगी।


