
सेवा और त्याग की प्रतिमूर्ति थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय: शैलेंद्र कुमार जैन विधायक
सागर/स्टेट हेड (अनिल तिवारी) भारतीय जनता पार्टी संभागीय कार्यालय में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की पुण्यतिथि का आयोजन किया गया इस कार्यक्रम को भाजपा द्वारा बलिदान दिवस के रूप में मनाया गया,कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विधायक शैलेंद्र कुमार जैन उपस्थित थे।कार्यक्रम के शुभारंभ ने सभी लोगों ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के चित्र के समक्ष पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधायक शैलेंद्र कुमार जैन ने कहा कि आज भारतीय जनता पार्टी अपने चरम उत्कर्ष पर है इसके पीछे अनेकों लोगों का बलिदान सम्मिलित जिन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाकर आज भाजपा को विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनाया है, उन्ही में से एक जन संघ के अध्यक्ष,अंत्योदय के प्रणेता, स्व पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी थे इनका जन्म 25 सितम्बर को मथुरा में हुआ था इनके पिता रेलवे में जलेसर रोड स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर थे। रेल की नौकरी होने के कारण उनके पिता का अधिक समय बाहर ही बीतता था। कभी-कभी छुट्टी मिलने पर ही घर आते थे।
दो वर्ष बाद दीनदयाल जी के भाई ने जन्म लिया, जिसका नाम शिवदयाल रखा गया। पिता भगवती प्रसाद ने बच्चों को ननिहाल भेज दिया। उस समय उपाध्याय जी के नाना चुन्नीलाल शुक्ल धानक्या (जयपुर, राज०) में स्टेशन मास्टर थे। नाना का परिवार बहुत बड़ा था। दीनदयाल अपने ममेरे भाइयों के साथ बड़े हुए। नाना का गाँव आगरा जिले में फतेहपुर सीकरी के पास ‘गुड़ की मँढई’ था

दीनदयाल अभी 3 वर्ष के भी नहीं हुये थे, कि उनके पिता का देहान्त हो गया। पति की मृत्यु से माँ रामप्यारी को अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा। वे अत्यधिक बीमार रहने लगीं। उन्हें क्षय रोग लग गया। 8 अगस्त 1924 को उनका भी देहावसान हो गया। उस समय दीनदयाल जी 7 वर्ष के थे। 1926 में नाना चुन्नीलाल भी नहीं रहे। 1931 में पालन करने वाली मामी का निधन हो गया। 18 नवम्बर 1934 को अनुज शिवदयाल ने भी उपाध्याय जी का साथ सदा के लिए छोड़कर दुनिया से विदा ले ली। 1935 में स्नेहमयी नानी भी स्वर्ग सिधार गयीं। 19 वर्ष की अवस्था तक उपाध्याय जी ने मृत्यु-दर्शन से गहन साक्षात्कार कर लिया था।
8वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उपाध्याय जी ने कल्याण हाईस्कूल, सीकर, राजस्थान से दसवीं की परीक्षा में बोर्ड में प्रथम स्थान प्राप्त किया। 1937 में पिलानी से इंटरमीडिएट की परीक्षा में पुनः बोर्ड में प्रथम स्थान प्राप्त किया। 1939 में कानपुर के सनातन धर्म कालेज से बी०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।ी से एम०ए० करने के लिए सेंट जॉन्स कालेज, आगरा में प्रवेश लिया और पूर्वार्द्ध में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुये। बीमार बहन रामादेवी की शुश्रूषा में लगे रहने के कारण उत्तरार्द्ध न कर सके। बहन की मृत्यु ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। मामाजी के बहुत आग्रह पर उन्होंने प्रशासनिक परीक्षा दी, उत्तीर्ण भी हुये किन्तु अंगरेज सरकार की नौकरी नहीं की। 1941 में प्रयाग से बी०टी० की परीक्षा उत्तीर्ण की। बी०ए० और बी०टी० करने के बाद भी उन्होंने नौकरी नहीं की।
1937 में जब वह कानपुर से बी०ए० कर थे, अपने सहपाठी बालूजी महाशब्दे की प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आये। संघ के संस्थापक डॉ० हेडगेवार का सान्निध्य कानपुर में ही मिला। उपाध्याय जी ने पढ़ाई पूरी होने के बाद संघ का दो वर्षों का प्रशिक्षण पूर्ण किया और संघ के जीवनव्रती प्रचारक हो गये। आजीवन संघ के प्रचारक रहे।
संघ के माध्यम से ही उपाध्याय जी राजनीति में आये। 21 अक्टूबर 1951 को डॉ० श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना हुई। गुरुजी (गोलवलकर जी) की प्रेरणा इसमें निहित थी। 1952 में इसका प्रथम अधिवेशन कानपुर में हुआ। उपाध्याय जी इस दल के महामंत्री बने। इस अधिवेशन में पारित 15 प्रस्तावों में से 7 उपाध्याय जी ने प्रस्तुत किये। डॉ० मुखर्जी ने उनकी कार्यकुशलता और क्षमता से प्रभावित होकर कहा- “यदि मुझे दो दीनदयाल मिल जाएं, तो मैं भारतीय राजनीति का नक्शा बदल दूँ।” कार्यक्रम को नगर अंत्योदय समिति सदस्य श्रीमती प्रतिभा चौबे एवं सुखदेव मिश्रा ने संबोधित किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से नगर निगम अध्यक्ष वृंदावन चौबे श्याम तिवारी, जगन्नाथ गुरैया जी ,लक्ष्मण सिंह जी,नितिन बंटी शर्मा,सुषमा यादव,विक्रम सोनी ,मनीष चौवे,रीतेश मिश्रा ,रिंकू राज,गोपी पंथी ,राकेश लारिया ,राहुल वैद्य,विकास केशरवानी,जयश्री चढ़ार, रामू ठेकेदार ,चेतराम अहिरवार,,प्रभुदयाल साहू ,रविन्द्र लारा सहित बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता उपस्थित थे।
